कलाकार विंग · कलाकार-पट्टिका · Artist Plate
रसूलन बाई
Rasoolan Bai
जन्मPratapgarh, United Provinces (now Uttar Pradesh), India
निधन1974
जीवन-पट्टी
The Life Specimen| नाम | रसूलन बाई · Rasoolan Bai |
|---|---|
| जन्म | Pratapgarh, United Provinces (now Uttar Pradesh), India |
| निधन | 1974 |
| भूमिकाएँ | गायक |
| विधाएँ | ठुमरी · दादरा · होली · Seasonal |
| भाषाएँ | braj |
पट्टिका-लेख
The Monographजीवनी Biography
रसूलन बाई (1902–1974) बनारस की पूरब-अंग ठुमरी की सम्राज्ञी थीं — वह आवाज़ जिसमें टप्पे की फुर्ती और ठुमरी की टीस एक साथ रहती थी। मिर्ज़ापुर में जन्म, बनारस की संगीत-परंपरा में तालीम; 'फूल गेंदवा न मारो' उनके नाम का पर्याय बना। एआईआर की नियमित कलाकार; 1969 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान। 1947 और 1969 के दंगों में घर खोया; अंतिम वर्ष कठिनाई में — भारतीय संगीत की सबसे मार्मिक कथाओं में।
अंग्रेज़ी में पढ़ें · Read in English
रसूलन बाई (1902–1974) बनारस की पूरब-अंग ठुमरी की सम्राज्ञी थीं — वह आवाज़ जिसमें टप्पे की फुर्ती और ठुमरी की टीस एक साथ रहती थी। मिर्ज़ापुर में जन्म, बनारस की संगीत-परंपरा में तालीम; 'फूल गेंदवा न मारो' उनके नाम का पर्याय बना। बीबीसी और एआईआर की नियमित कलाकार; 1969 में संगीत नाटक अकादमी सम्मान। 1947 और फिर 1969 के दंगों में घर-गृहस्थी खोई; अंतिम वर्ष कठिनाई में बीते — उनकी कथा भारतीय संगीत की सबसे मार्मिक कथाओं में है।
विरासत Legacy
उनके तवे आज भी पूरब-अंग की कसौटी हैं; गिरिजा देवी और बनारस-परंपरा ने उनका बोल-बनाव जीवित रखा।
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Her records remain the reference purab-ang; Girija Devi and the Banaras line kept her bol-banao alive.
गायन-शैली Musical Style
ठुमरी की टीस के भीतर टप्पे-सी फुर्ती; बनारस की वह आवाज़ 'जो खेलते हुए रोती है'।
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Tappa-quick ornament inside thumri's ache; the Banaras 'voice that weeps while it plays'.
सांस्कृतिक प्रभाव Cultural Impact
सिद्धेश्वरी देवी के साथ उन्होंने तवायफ़-परंपरा की कला को गरिमा समेत मंच-और-रेडियो युग तक पहुँचाया।
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With Siddheshwari Devi she carried the tawaif tradition's art into the concert-and-radio age with dignity intact.
तालीम, विधाएँ और भाषाएँ
Training · Genres · Languagesजीवन-रेखा
Career Highlights- 1936 तवे पर 'फूल गेंदवा न मारो' — उनका हस्ताक्षर 'Phool Gendwa Na Maro' on disc — her signature
- 1969 संगीत नाटक अकादमी सम्मान Sangeet Natak Akademi Award
पुरस्कार एवं सम्मान
Awards & Recognition- 1969 संगीत नाटक अकादमी सम्मान Sangeet Natak Akademi Award
अन्य विवरण
More Details- Death Year
- 1974
Legacy
उनके तवे आज भी पूरब-अंग की कसौटी हैं; गिरिजा देवी और बनारस-परंपरा ने उनका बोल-बनाव जीवित रखा।
Her records remain the reference purab-ang; Girija Devi and the Banaras line kept her bol-banao alive.
Musical Style
ठुमरी की टीस के भीतर टप्पे-सी फुर्ती; बनारस की वह आवाज़ 'जो खेलते हुए रोती है'।
Tappa-quick ornament inside thumri's ache; the Banaras 'voice that weeps while it plays'.
अभिलेख-सार
Discography Summary| संग्रह में गीत | 3 — नीचे जुड़े हुए पन्नों में सूचीबद्ध |
|---|---|
| कुल ज्ञात रिकॉर्डिंग | 3 — 3 संग्रह में उपलब्ध |
| रिकॉर्डिंग-काल | 1936–1945 · पहला सत्र 1936 |
| फ़िल्में व डिस्क | His Master'S Voice (C.1936) · His Master'S Voice (C.1940) · His Master'S Voice (C.1945) |
| रिकॉर्ड लेबल | HMV |
| प्रमुख भूमिका | गायक |
| नित्य सहयोगी | Traditional (Holi/Braj Folk Classical Text) · Wajid Ali Shah (Attributed) · Traditional (Monsoon/Braj Seasonal Text) |
| हस्ताक्षर-गीत | Phool Gendwa Na Maro (Pilu Thumri) · Babul Mora Naihar Chhuto Jaye (Thumri) |
| स्रोत | derived from the HindiGeet song archive |
जुड़े हुए पन्ने
Connected Plates · The Graph Made Visibleअटलस में कोई पन्ना अकेला नहीं — रसूलन बाई से उनके गीत, फ़िल्में, घराना, समकालीन और युग, सब यहाँ से खुलते हैं।
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