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लाज मोरी राखो हो ग़रीब निवाज़ — संगम (1941) YouTube (click-to-load)

गीत विंग · गीत-पट्टिका · Song Plate

लाज मोरी राखो हो ग़रीब निवाज़

Laaj Mori Rakho Ho Gareeb Nivaz

संगम (1941) की एक भक्ति-विनती — 'मेरी लाज रखो, हे ग़रीब निवाज़'।

भावभक्ति · Imploring

भाषाhindi   गतिमध्यम   स्वरूपएकल महिला

श्रेय

The Credits

सूत्र-वाक्य · The Hook

सूत्र-वाक्य

संगम (1941) की एक भक्ति-विनती — 'मेरी लाज रखो, हे ग़रीब निवाज़'।

In EnglishA devotional plea from Sangam (1941) — 'protect my honour, O protector of the poor.'

पट्टिका-लेख

The Monograph

परिचय Overview

दादा चांदेकर द्वारा रचित और सुंदराबाई द्वारा अमृतलाल नागर के बोलों पर गाया, यह नवयुग चित्रपट की संगम (1941) के चौदह गीतों में से एक है। यह ईश्वर को ग़रीब निवाज़ (निर्धनों के रक्षक) के रूप में संबोधित करता है — एक ऐसा वाक्यांश जो भक्ति और सूफ़ी दोनों भक्ति-शब्दावली में सामान्य है — और गायिका की लाज बचाने की विनती करता है।

अंग्रेज़ी में पढ़ें · Read in English

Composed by Dada Chandekar and sung by Sundarabai to lyrics by Amritlal Nagar, this is one of the fourteen songs in Navyug Chitrapat's Sangam (1941). It addresses the divine as Gareeb Nivaz (protector of the poor), a phrase common to both Bhakti and Sufi devotional vocabulary, asking that the singer's honour be safeguarded.

वर्गीकरण

Classification

Genre

FilmiBhajan
Tempo
Medium

नमूना-पट्टी

The Specimen Table
गीत-नमूना · Song Specimen
शीर्षकलाज मोरी राखो हो ग़रीब निवाज़ · Laaj Mori Rakho Ho Gareeb Nivaz
फ़िल्मसंगम · 1941
वर्ष · युग1941
गायकसुंदराबाई
गीतकारAmritlal Nagar
संगीतकारDada Chandekar
स्वरूपएकल महिला
गतिमध्यम
भाषाhindi
भावभक्ति · Imploring
बोल-स्थितिकेवल झलक

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