हिंदी गीत संगीत का अटलस
पुरानी एचएमवी ग्रामोफोन रिकॉर्ड प्लेयर
पुरानी एचएमवी ग्रामोफोन रिकॉर्ड प्लेयर Wikimedia Commons · CC0

कहानियाँ विंग · कहानी · Classical Dance

नवरस और शास्त्रीय नृत्य: भावों की अभिव्यक्ति

Navarasa and Classical Dance: Expression of Emotions

नवरस और शास्त्रीय नृत्य: अभिनय की कला

श्रेणीClassical Danceप्रकारविशेष लेखपाठ१२ मिनट

प्रकाशित31 March 2026  पाठ१२ मिनट का पाठ

आमुख

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की नींव में रस का सिद्धांत निहित है। 'रस' का अर्थ है 'रस' या 'स्वाद' — वह भावनात्मक सार जो दर्शक के मन में उत्पन्न होता है। दूसरी शताब्दी में, महान नाटककार भरत ने अपने ग्रंथ 'नाट्य शास्त्र' में नौ मुख्य रसों की पहचान की, जिन्हें नवरस कहते हैं। ये नौ रस हैं: रौद्र (क्रोध), हास्य (हँसी), करुण (दुःख), वीर (वीरता), भयानक (डर), विभत्स (घृणा), अद्भुत (आश्चर्य), शृंगार (प्रेम और इच्छा), और शांत (शांति)। प्रत्येक रस एक अद्वितीय भावनात्मक अवस्था है, और एक कुशल नर्तकी इन सभी को अपन

अंग्रेज़ी में पढ़ें · Read in English

At the foundation of Indian classical dance lies the theory of rasa. 'Rasa' means 'essence' or 'taste' — the emotional flavour that emerges in the audience's mind.

भारतीय नृत्य में रस का सिद्धांत

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की नींव में रस का सिद्धांत निहित है। 'रस' का अर्थ है 'रस' या 'स्वाद' — वह भावनात्मक सार जो दर्शक के मन में उत्पन्न होता है। दूसरी शताब्दी में, महान नाटककार भरत ने अपने ग्रंथ 'नाट्य शास्त्र' में नौ मुख्य रसों की पहचान की, जिन्हें नवरस कहते हैं। ये नौ रस हैं: रौद्र (क्रोध), हास्य (हँसी), करुण (दुःख), वीर (वीरता), भयानक (डर), विभत्स (घृणा), अद्भुत (आश्चर्य), शृंगार (प्रेम और इच्छा), और शांत (शांति)। प्रत्येक रस एक अद्वितीय भावनात्मक अवस्था है, और एक कुशल नर्तकी इन सभी को अपने शरीर, चेहरे और गति के माध्यम से व्यक्त कर सकती है। नृत्य का उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं है — यह दर्शकों के हृदय में गहरी भावनाओं को जगाना और उन्हें सुखद भावनात्मक स्थिति में ले जाना है। यह प्रक्रिया को 'रस-निष्पत्ति' कहा जाता है, जहाँ नर्तकी विभिन्न अभिनय तकनीकों (अभिनय) का उपयोग करके दर्शकों में रस का अनुभव कराती है। नटों का कहना है कि शास्त्रीय नृत्य 'अनभिमानिका अपि नर्तकी' — एक ऐसी कला है जो मानवीय भावनाओं की सबसे सूक्ष्म गतिविधियों को प्रकट करती है। नर्तकी के शरीर पर कोई भी हलचल, आँखों की कोई भी गति, होंठों की कोई भी मुस्कुराहट — सब कुछ एक सुनियोजित भाषा है जो सदियों से परिष्कृत की गई है। यह भाषा मुद्राओं (हाथ और पैरों के संकेत), रस (चेहरे के भाव), और शरीर की गति को मिश्रित करती है ताकि एक सर्वाधिक प्रभावशाली कलात्मक अभिव्यक्ति बन सके।

अभिनय: नृत्य की भाषा

अभिनय का अर्थ है 'अभिनय' — गति, भाव और संवेग को व्यक्त करना। नाट्य शास्त्र में अभिनय को चार भागों में विभाजित किया गया है: आंगिक (शरीर की गति), वाचिक (आवाज़ और शब्द), आहार्य (परिधान और मेकअप), और सात्विक (मनोवैज्ञानिक भाव)। भारतीय नृत्य में, सबसे महत्वपूर्ण तीन हैं: आंगिक, वाचिक (जो संगीत के माध्यम से व्यक्त होता है), और सात्विक। आंगिक अभिनय तीन स्तरों पर काम करता है: (1) मुद्रा — हाथों और पैरों की विशिष्ट अवस्थाएँ जो विशिष्ट अर्थ प्रकट करती हैं; (2) गति — शरीर के विभिन्न भागों की गतिविधि, जैसे धड़, गर्दन, सिर; (3) नृत्य की गति (ताल) — शारीरिक गतियों की लय और टाइमिंग। एक भारतीय शास्त्रीय नर्तकी को हज़ारों मुद्राओं को याद रखना चाहिए। एक एकल हाथ की मुद्रा, या हस्त मुद्रा, किसी चीज़ का प्रतिनिधित्व कर सकती है — एक फूल, एक पक्षी, पानी, आग, या एक भावना। वाचिक अभिनय शब्दों और आवाज़ की गुणवत्ता के माध्यम से किया जाता है, लेकिन शुद्ध नृत्य में, यह संगीत के माध्यम से व्यक्त होता है। संगीतकार और नर्तकी एक दूसरे के साथ संवाद करते हैं — संगीत नर्तकी के अभिनय को समर्थन करता है, और नर्तकी की गति संगीत में नई आयामों को जोड़ती है। सात्विक अभिनय सबसे गहरा है — यह आंतरिक भावनाओं को व्यक्त करता है। एक नर्तकी को सिर्फ़ शरीर से नहीं, बल्कि आत्मा से नृत्य करना चाहिए। जब दर्शक एक नर्तकी को देखते हैं और महसूस करते हैं कि उसके हर हलचल के पीछे एक विश्वास है, एक भावना है, तो यह सात्विक अभिनय है।

भरतनाट्यम् नृत्यांगना पूर्ण शास्त्रीय मुद्रा में — दक्षिण भारत की प्राचीन नृत्य परंपरा जो चेहरे के भावों (अभिनय) और हस्त मुद्राओं से नौ रसों को सबसे सटीक रूप से व्यक्त करती है
भरतनाट्यम् नृत्यांगना पूर्ण शास्त्रीय मुद्रा में — दक्षिण भारत की प्राचीन नृत्य परंपरा जो चेहरे के भावों (अभिनय) और हस्त मुद्राओं से नौ रसों को सबसे सटीक रूप से व्यक्त करती है Wikimedia Commons · CC BY-SA 3.0

नौ रस: चेहरे और शरीर में व्यक्ति होना

प्रत्येक रस का एक विशिष्ट भावनात्मक हस्ताक्षर होता है, और नर्तकियाँ इसे अपने चेहरे के भावों, शरीर की स्थिति और गति के माध्यम से व्यक्त करती हैं। शृंगार रस (प्रेम और इच्छा): यह सबसे रोमांचक रस है, जो प्रेम, सौंदर्य और इच्छा से संबंधित है। नर्तकी की आँखें आधी बंद हो जाती हैं, होंठ मुस्कुराते हैं, और शरीर की गतियाँ तरल और आकर्षक हो जाती हैं। हाथों की मुद्राएँ कोमलता से काम करती हैं, और सिर धीरे-धीरे गतिविधि करता है। भरतनाट्यम् में शृंगार रस को अक्सर 'जरा धीरे जरा' जैसे गीतों में दिखाया जाता है, जहाँ नर्तकी प्रेमी को प्रलोभन देती है। करुण रस (दुःख): दुःख, विलाप और हानि का रस। नर्तकी की आँखें नीचे देखती हैं, कंधे थोड़े आगे झुकते हैं, और शरीर की गतियाँ धीमी और भारी हो जाती हैं। आँखों से आँसू भी बह सकते हैं। मुद्राएँ दुःख व्यक्त करती हैं — हाथ सिर पर, या छाती पर दबे हुए। भरतनाट्यम् में करुण रस को अक्सर तब दिखाया जाता है जब राधा कृष्ण के प्रस्थान पर विलाप करती है। रौद्र रस (क्रोध): क्रोध, आक्रोश और आक्रमण का रस। आँखें चौड़ी खुली हैं, भौंहें तनी हुई हैं, और नासिका फूली हुई है। पूरा चेहरा तीव्रता से लाल हो जाता है। शरीर की गतियाँ तीव्र और आक्रामक हैं। पैर ज़ोर से जमीन पर बजते हैं। कथक में रौद्र रस को अक्सर शिव के नृत्य में दिखाया जाता है। वीर रस (वीरता और साहस): साहस, शक्ति और विजय का रस। छाती फूली हुई है, सिर ऊँचा है, और आँखें आत्मविश्वासी और स्थिर हैं। शरीर की गतियाँ मजबूत और निर्णायक हैं। पैर ज़ोर से ज़मीन पर बजते हैं। भारत नाट्यम् में वीर रस को अक्सर योद्धा या शक्तिशाली देवी के अभिनय में दिखाया जाता है। भयानक रस (डर): डर, भय और आतंक का रस। आँखें चौड़ी खुली हैं, शरीर कंपकंपाता है, और गतियाँ अस्थिर और चिंतित हैं। हाथ सिर के पास हो सकते हैं, या शरीर को गले लगा सकते हैं। चेहरा भय दिखाता है। ओड़िसी में भयानक रस को अक्सर दुष्ट की कहानियों में दिखाया जाता है। विभत्स रस (घृणा): घृणा, सड़न और विकर्षण का रस। नाक सिकुड़ी हुई है, होंठ ऊपर उठे हुए हैं, और पूरा चेहरा विकृत दिखाई देता है। शरीर से दूर हटने की गतियाँ दिखाई देती हैं। यह रस शायद ही कभी शुद्ध नृत्य में दिखाई देता है, लेकिन नाटकीय प्रदर्शन में आ सकता है। अद्भुत रस (आश्चर्य): आश्चर्य, विस्मय और चमत्कार का रस। आँखें चौड़ी खुली हैं, भौंहें ऊपर उठी हुई हैं, और मुँह थोड़ा खुला है। शरीर अवाक दिखाई देता है। हाथ अचानक ऊपर उठते हैं। भारतनाट्यम् में अद्भुत रस को अक्सर तब दिखाया जाता है जब कोई दिव्य दृश्य प्रकट होता है। हास्य रस (हँसी): हँसी, विनोद और प्रफुल्लता का रस। चेहरा हल्के-फुल्के भाव दिखाता है, होंठ हँसते हैं, और आँखें चमकदार हैं। शरीर की गतियाँ हल्की और आनंदित हैं। भरतनाट्यम् में हास्य रस को अक्सर शरारतपूर्ण कृष्ण की कहानियों में दिखाया जाता है। शांत रस (शांति): शांति, ध्यान और आध्यात्मिक संतुष्टि का रस। चेहरा शांत और सुखद है, आँखें नीचे या बंद हैं, और शरीर की गतियाँ धीमी और नियंत्रित हैं। यह रस अक्सर नृत्य के अंत में दिखाई देता है, दर्शकों को शांति में ले जाने के लिए।

भरतनाट्यम्, कथक और ओड़िसी में रस की अभिव्यक्ति

भारतीय शास्त्रीय नृत्य की तीन मुख्य परंपराएँ हैं: भरतनाट्यम् (तमिलनाडु), कथक (उत्तर भारत), और ओड़िसी (ओड़िशा)। हालाँकि सभी नवरस का उपयोग करते हैं, लेकिन प्रत्येक परंपरा का अपना अद्वितीय तरीका है रसों को व्यक्त करने का। भरतनाट्यम्: यह सबसे प्राचीन और सबसे परिष्कृत परंपरा है। भरतनाट्यम् नर्तकियाँ छोटे, स्टैटिक अवस्थाओं में बहुत समय बिताती हैं, जहाँ शरीर अभी भी है लेकिन चेहरा और आँखें भावनाओं से भरी हैं। रास (चेहरे के भाव) को भरतनाट्यम् में सर्वाधिक महत्त्व दिया जाता है। नर्तकी की आँखें बहुत सक्रिय हैं — वे विभिन्न दिशाओं को देखती हैं, जो विभिन्न पात्रों या भावनाओं का संकेत है। उदाहरण के लिए, जब वह शृंगार रस व्यक्त करती है, तो आँखें आधी बंद हो जाती हैं, पलकें धीरे-धीरे हिलती हैं, और नज़र इस तरह से भटकती है जैसे वह किसी को खोज रही हो। हाथों की मुद्राएँ बहुत महीन हैं, और पैरों की थिरकन एक सटीक ताल का पालन करती है। कथक: यह परंपरा सारे भारत में घूमने वाले कहानीकारों से उत्पन्न हुई है, जो शहरों और गाँवों में कहानियाँ सुनाते थे। कथक में रस अक्सर गहरी वैयक्तिकता और तीव्र भावनात्मक परिवर्तन के साथ व्यक्त किया जाता है। कथक नर्तकी अपने पूरे शरीर का उपयोग करती है — धड़, कंधे, और सबसे महत्त्वपूर्ण, हाथ। एक सिंगल गति में नर्तकी विभिन्न भावनाओं को जल्दी-जल्दी दिखा सकती है। उदाहरण के लिए, वह प्रेम को दिखा सकती है, फिर तुरंत दुःख, फिर क्रोध — सब कुछ कुछ सेकंड में। कथक में, चेहरे की भावनाएँ बहुत सूक्ष्म हो सकती हैं, लेकिन शरीर की गतियाँ तीव्र और गतिशील हैं। ओड़िसी: यह परंपरा मंदिरों से उत्पन्न हुई है, और इसमें एक मधुर और तरल गुणवत्ता है। ओड़िसी नर्तकी का शरीर 'चंद्रहास' (चाँद की मुस्कुराहट) की मुद्रा में रहता है — एक सुंदर S-आकार की वक्र। रसों को अक्सर पूरे शरीर में व्यक्त किया जाता है, सिर्फ़ चेहरे में नहीं। ओड़िसी में, हिप्स और शरीर की गति बहुत महत्त्वपूर्ण हैं। उदाहरण के लिए, शृंगार रस में, नर्तकी की कमर की गति तरल और संवेदनशील हो जाती है, जो प्रेम की अभिव्यक्ति है।

कथक नृत्यांगना प्रदर्शन में — उत्तर भारत की कथा-नृत्य परंपरा जो तीव्र भावनात्मक परिवर्तनों से नवरस व्यक्त करती है
कथक नृत्यांगना प्रदर्शन में — उत्तर भारत की कथा-नृत्य परंपरा जो तीव्र भावनात्मक परिवर्तनों से नवरस व्यक्त करती है Wikimedia Commons · CC BY 4.0

मुद्रा भाषा: हाथ और पैर जो बोलते हैं

मुद्राएँ शास्त्रीय नृत्य की सबसे महत्त्वपूर्ण भाषा हैं। एक एकल हाथ की मुद्रा का एक विशिष्ट अर्थ है, और जब दो हाथ मिलकर काम करते हैं, तो वे जटिल विचार व्यक्त कर सकते हैं। नाट्य शास्त्र में 24 प्रमुख हस्त मुद्राओं का उल्लेख है, लेकिन भरतनाट्यम् में यह संख्या 108 तक पहुँचती है। कुछ सबसे महत्त्वपूर्ण मुद्राएँ: • पाशा मुद्रा — फूल या धनुष को दर्शाती है। हाथ एक विशिष्ट आकार बनाता है, जहाँ उँगलियाँ एक संकेत करती हैं। • मत्स्य मुद्रा — मछली को दर्शाती है। हाथ मछली की तरह हिलता-डुलता है, जो पानी की सुंदरता को व्यक्त करता है। • सिंह मुद्रा — शेर को दर्शाती है, वीरता और शक्ति का प्रतीक। • अंजलि मुद्रा — दोनों हाथ प्रणाम की स्थिति में मिलते हैं, जो सम्मान या प्रार्थना को दर्शाता है। • त्रिपतक मुद्रा — एक पक्षी को दर्शाती है, जो स्वतंत्रता और आध्यात्मिकता का प्रतीक है। पैरों की मुद्राएँ भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। पैरों की टेप (ताली) विभिन्न तरीकों से की जा सकती है, जो विभिन्न भावनाओं को व्यक्त करती है। जब एक नर्तकी क्रोध दिखाती है, तो पैर तेज़ी से ज़मीन को टेपते हैं। जब वह प्रेम दिखाती है, तो पैर नरमी से जमीन को स्पर्श करते हैं। मुद्राएँ और शरीर की गति एक साथ काम करते हैं। उदाहरण के लिए, करुण रस (दुःख) को व्यक्त करने के लिए, नर्तकी निम्नलिखित कर सकती है: 1. दोनों हाथ सिर के पास लाना (दुःख और विलाप का संकेत) 2. धीरे-धीरे हाथ नीचे करना, जबकि शरीर आगे झुकता है 3. पैरों की गति धीमी और भारी करना, जैसे कि भारी हृदय से चल रही हो 4. चेहरे पर उदास भाव बनाना, आँखें नीचे देखना ये सभी तत्व एक साथ एक सुसंगत छवि बनाते हैं जो दर्शक के मन में दुःख की भावना को जगाता है। मुद्राओं की सुंदरता यह है कि वे सार्वभौमिक हैं। एक भारतीय दर्शक, एक यूरोपीय दर्शक, या किसी भी संस्कृति का दर्शक, जब एक नर्तकी करुण रस को देखता है, तो वह दुःख को समझता है। भाषा परिवर्तित हो सकती है, लेकिन भावना सार्वभौमिक है।

नृत्य का आध्यात्मिक पहलू: रस-निष्पत्ति की यात्रा

शास्त्रीय नृत्य का अंतिम उद्देश्य केवल दर्शकों को मनोरंजित करना नहीं है, बल्कि उन्हें एक आध्यात्मिक अवस्था में ले जाना है। यह प्रक्रिया 'रस-निष्पत्ति' कहलाती है — रस का जन्म या उत्पन्न होना। इसका मतलब है कि दर्शक केवल किसी अन्य व्यक्ति के भावों को नहीं देख रहे हैं, बल्कि ये भाव उनके अपने मन में जीवंत हो जाते हैं। यह एक अद्भुत प्रक्रिया है। एक नर्तकी और दर्शक के बीच का संबंध एक अदृश्य सेतु है। नर्तकी अपनी भावनाओं को शरीर, चेहरे और आत्मा के माध्यम से व्यक्त करती है, और दर्शक इन भावनाओं को अवशोषित करते हैं। दर्शक को महसूस होता है कि वह स्वयं को हटा रहे हैं और केवल रस में डूब रहे हैं। यह एक गहरी ध्यानात्मक अवस्था है। जब एक दर्शक एक भरतनाट्यम् प्रदर्शन देखता है, विशेषकर जब शांत रस को दिखाया जाता है, तो वह एक प्रकार की शांति में चला जाता है। यह शांति बाहरी नहीं है — यह आंतरिक है। यह आत्मा से उत्पन्न होती है। कई प्राचीन ग्रंथों में कहा गया है कि नृत्य एक साधना है, एक मार्ग जो मानव मन को आध्यात्मिकता की ओर ले जाता है। भरत ने कहा कि जो व्यक्ति रस को समझता है, वह आत्म-ज्ञान के करीब है। यह एक दार्शनिक कथन है, लेकिन इसमें सत्य है। जब हम प्रकृत (सच्चे) नृत्य को देखते हैं, हम न केवल चालाकी को देखते हैं, बल्कि मानवीय अवस्थिति के गहरे सत्य को भी देखते हैं। नर्तकियाँ यह जानती हैं। वे जानती हैं कि उनके काम का अंतिम उद्देश्य दर्शकों के हृदय में एक पवित्र अनुभूति जगाना है। वे न केवल कला के नियमों का पालन करती हैं, बल्कि एक आध्यात्मिक प्रतिज्ञा भी निभाती हैं।

परिचय

Identity
Epithet
नवरस और शास्त्रीय नृत्य: अभिनय की कला · Navarasa and Classical Dance: The Art of Expression

श्रवण-कक्ष · The Listening Room

इस कहानी के वीडियो

नवरस — शास्त्रीय नृत्य प्रस्तुति

नवरस — नौ भाव नृत्य में

कहानी-नमूना

The Story Specimen
कहानी-नमूना · Story Specimen
शीर्षकनवरस और शास्त्रीय नृत्य: भावों की अभिव्यक्ति · Navarasa and Classical Dance: Expression of Emotions
श्रेणीClassical Dance
प्रकारविशेष लेख
पाठ-समय१२ मिनट का पाठ
प्रकाशित31 March 2026 — admin
टैगnavarasa · rasa_theory · bharatanatyam · kathak · odissi · abhinaya · mudra · classical_dance · indian_aesthetics · facial_expression

इस कहानी में

In This Story · The Cast & Its Plates

कहानी में आए नामों के अटलस में अपने पन्ने हैं — यहीं से यात्रा जारी रखिए।

राग-सूत्र · Raags

और कहानियाँ

More Stories from the Atlas
कहानी · Storyशहंशाह की अंतिम आवाज़: सहगल का तदबीर और एक युग का ढलना कहानी · Storyमहिला प्रभुत्व: 1906 ग्रामोफोन की महिला सितारें कहानी · Storyऑल इंडिया रेडियो: आज़ादी के बाद का संगीत संरक्षक

साझा कीजिए · Share this Plate

यह पन्ना आगे बढ़ाइए