गीत विंग · गीत-पट्टिका · Song Plate
रूह किस मस्त की प्यासी गई मैख़ाने से
Ruh Kis Mast Ki Pyasi Gayi Maikhane Se
किस मस्त की रूह मैख़ाने से प्यासी ही चली गई? — सूफ़ी मयख़ाने की कल्पना में डूबा गीत।
भावतीव्र · दार्शनिक
भाषाhindi-urdu गतिधीमी स्वरूपएकल पुरुष
श्रेय
The Creditsसूत्र-वाक्य · The Hook
सूत्र-वाक्य
किस मस्त की रूह मैख़ाने से प्यासी ही चली गई? — सूफ़ी मयख़ाने की कल्पना में डूबा गीत।
In EnglishWhose restless soul left the tavern still thirsting? — a song steeped in Sufi tavern imagery.
पट्टिका-लेख
The Monographपरिचय Overview
हिम्मत (1941) का एक पुरुष एकल, करीमदाद ख़ान के स्वर में, संगीत गोबिंद राम का और बोल अज़ीज़ कश्मीरी के। मैख़ाने की कल्पना और प्यासी ही चली गई रूह की छवि उस लंबी सूफ़ी-ग़ज़ल परंपरा से आती है जिसमें मय और मस्ती ईश्वरीय चाह के प्रतीक हैं।
अंग्रेज़ी में पढ़ें · Read in English
A male solo from Himmat (1941) sung by Karimdad Khan, composed by Gobind Ram with lyrics by Aziz Kashmiri. The imagery of the maikhana (tavern) and a soul that leaves still thirsting draws on the long Sufi-ghazal tradition in which wine and intoxication stand for divine longing.
वर्गीकरण
Classification- Tempo
- Slow
Genre
नमूना-पट्टी
The Specimen Table| शीर्षक | रूह किस मस्त की प्यासी गई मैख़ाने से · Ruh Kis Mast Ki Pyasi Gayi Maikhane Se |
|---|---|
| फ़िल्म | हिम्मत · 1941 |
| वर्ष · युग | 1941 |
| गायक | करीमदाद ख़ान |
| गीतकार | Aziz Kashmiri |
| संगीतकार | Gobind Ram |
| स्वरूप | एकल पुरुष |
| गति | धीमी |
| भाषा | hindi-urdu |
| भाव | तीव्र · दार्शनिक |
| बोल-स्थिति | केवल झलक |
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