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रूह किस मस्त की प्यासी गई मैख़ाने से — हिम्मत (1941) YouTube (click-to-load)

गीत विंग · गीत-पट्टिका · Song Plate

रूह किस मस्त की प्यासी गई मैख़ाने से

Ruh Kis Mast Ki Pyasi Gayi Maikhane Se

किस मस्त की रूह मैख़ाने से प्यासी ही चली गई? — सूफ़ी मयख़ाने की कल्पना में डूबा गीत।

भावतीव्र · दार्शनिक

भाषाhindi-urdu   गतिधीमी   स्वरूपएकल पुरुष

श्रेय

The Credits
गायक · Singerकरीमदाद ख़ानगीतकार · LyricistAziz Kashmiriसंगीतकार · MusicGobind Ram

सूत्र-वाक्य · The Hook

सूत्र-वाक्य

किस मस्त की रूह मैख़ाने से प्यासी ही चली गई? — सूफ़ी मयख़ाने की कल्पना में डूबा गीत।

In EnglishWhose restless soul left the tavern still thirsting? — a song steeped in Sufi tavern imagery.

पट्टिका-लेख

The Monograph

परिचय Overview

हिम्मत (1941) का एक पुरुष एकल, करीमदाद ख़ान के स्वर में, संगीत गोबिंद राम का और बोल अज़ीज़ कश्मीरी के। मैख़ाने की कल्पना और प्यासी ही चली गई रूह की छवि उस लंबी सूफ़ी-ग़ज़ल परंपरा से आती है जिसमें मय और मस्ती ईश्वरीय चाह के प्रतीक हैं।

अंग्रेज़ी में पढ़ें · Read in English

A male solo from Himmat (1941) sung by Karimdad Khan, composed by Gobind Ram with lyrics by Aziz Kashmiri. The imagery of the maikhana (tavern) and a soul that leaves still thirsting draws on the long Sufi-ghazal tradition in which wine and intoxication stand for divine longing.

वर्गीकरण

Classification

Genre

FilmiGhazal
Tempo
Slow

नमूना-पट्टी

The Specimen Table
गीत-नमूना · Song Specimen
शीर्षकरूह किस मस्त की प्यासी गई मैख़ाने से · Ruh Kis Mast Ki Pyasi Gayi Maikhane Se
फ़िल्महिम्मत · 1941
वर्ष · युग1941
गायककरीमदाद ख़ान
गीतकारAziz Kashmiri
संगीतकारGobind Ram
स्वरूपएकल पुरुष
गतिधीमी
भाषाhindi-urdu
भावतीव्र · दार्शनिक
बोल-स्थितिकेवल झलक

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